60 साल के कब्जे का दावा नहीं चला, नागेश्वरजी मंदिर की भूमि पर कोर्ट का बड़ा फैसला

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रतलाम/रावटी। ग्राम कुंवरवाड़ा, तहसील रावटी स्थित श्री नागेश्वरजी मंदिर की शासकीय भूमि को लेकर चल रहे लंबे कानूनी विवाद में सप्तम जिला न्यायाधीश रतलाम राजेश नामदेव की अदालत ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायालय ने भूमि पर स्वामित्व का दावा करने वाले वादी की अपील खारिज करते हुए शासकीय मंदिर की भूमि पर राज्य शासन का स्वत्व एवं स्वामित्व बरकरार रखा है।

राज्य शासन की ओर से पैरवी कर रहे शासकीय अधिवक्ता समरथ पाटीदार के अनुसार, विवादित भूमि को लेकर वर्ष 1984 से न्यायालयीन विवाद चला आ रहा था। अतिरिक्त व्यवहार न्यायाधीश सैलाना द्वारा 31 अक्टूबर 2025 को वादी कृष्ण कुमार पिता मांगीलाल तेली एवं अन्य का दावा निरस्त किया गया था। इसके बाद वादी की ओर से जिला न्यायालय में अपील प्रस्तुत की गई थी।

 

राजस्व रिकॉर्ड में कलेक्टर मंदिर के प्रबंधक

अपील की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने राजस्व अभिलेख, खसरा, खतौनी सहित अन्य दस्तावेजों का परीक्षण किया। न्यायालय के समक्ष यह तथ्य आया कि विवादित भूमि श्री नागेश्वरजी मंदिर, कुंवरवाड़ा की है और राजस्व रिकॉर्ड में मंदिर के प्रबंधक के रूप में कलेक्टर, रतलाम का नाम दर्ज है।

अदालत ने माना कि वादी ऐसा कोई ठोस दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके, जिससे विवादित भूमि पर उनका स्वामित्व सिद्ध हो सके।

60 साल के कब्जे का दावा भी नहीं हुआ प्रमाणित

वादी की ओर से भूमि पर 60 वर्ष से अधिक समय से शांतिपूर्ण एवं निरंतर कब्जे और खेती करने का दावा किया गया था। इसी आधार पर प्रतिकूल आधिपत्य के जरिए स्वामित्व हासिल होने तथा राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज करने की मांग की गई थी।

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हालांकि न्यायालय ने पाया कि वादी यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित नहीं कर सके कि वे किस निश्चित तारीख से भूमि पर कब्जे में आए, कब्जे की प्रकृति क्या थी और वास्तविक स्वामी के अधिकार के प्रतिकूल उनका कब्जा कब से रहा।

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अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल लंबे समय तक कब्जा होना अपने आप में प्रतिकूल आधिपत्य से स्वामित्व साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए आवश्यक तथ्यों और कब्जे की प्रकृति का स्पष्ट एवं ठोस प्रमाण आवश्यक है।

वर्ष 1984 से चल रहा था विवाद ।

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प्रकरण में यह भी सामने आया कि भूमि को लेकर वर्ष 1984 में व्यवहार वाद दायर किया गया था, जिसे वर्ष 1992 में निरस्त कर दिया गया। इसके बाद प्रथम अपील भी निरस्त हुई और द्वितीय अपील का वर्ष 2011 में निराकरण हुआ।

इसके बावजूद वर्ष 2016 में पुनः समान प्रकृति का व्यवहार वाद प्रस्तुत किया गया। न्यायालय के समक्ष इन पूर्व न्यायालयीन कार्यवाहियों का भी उल्लेख किया गया।

बेदखली की कार्रवाई पर भी अदालत की अहम टिप्पणी

न्यायालय ने माना कि वादी के विरुद्ध अतिक्रमण संबंधी कार्रवाई और कारण बताओ सूचना पत्र जारी किए गए थे। अदालत ने यह भी कहा कि कलेक्टर एवं तहसीलदार द्वारा वादी के कब्जे में किसी अवैध तरीके से हस्तक्षेप नहीं किया गया है। शासकीय भूमि से संबंधित विधि अनुसार की जा रही कार्रवाई को अवैध हस्तक्षेप नहीं माना जा सकता।

न्यायालय ने निर्णय की प्रति कलेक्टर रतलाम एवं तहसीलदार रावटी को भेजते हुए उन्हें विधि अनुसार कार्रवाई करने की स्वतंत्रता दी है।

इस मामले में राज्य शासन की ओर से शासकीय अधिवक्ता समरथ पाटीदार ने पैरवी की।

Naradh News24
Author: Naradh News24

प्रधान संपादक

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