ग्रीन फील्ड सड़क परियोजना में कम मुआवजे का आरोप, किसानों के साथ धरने पर बैठे विधायक; कलेक्टर को बाहर आकर सुननी पड़ी शिकायत
📰 विस्तृत खबर
रतलाम। जिले में उज्जैन-जावरा ग्रीन फील्ड सड़क परियोजना के तहत भूमि अधिग्रहण को लेकर विवाद अब खुलकर सामने आ गया है। कम मुआवजे से नाराज किसानों के समर्थन में आलोट विधायक चिंतामणी मालवीय शनिवार को कलेक्ट्रेट की सीढ़ियों पर धरने पर बैठ गए। उनके साथ जिला पंचायत अध्यक्ष पति, भारतीय किसान संघ के जिलाध्यक्ष और बड़ी संख्या में ग्रामीण एवं महिलाएं भी मौजूद रहीं।

धरने के दौरान विधायक ने प्रशासन के प्रति कड़ा रुख अपनाते हुए चेतावनी दी कि यदि किसानों की मांगों को अनदेखा किया गया, तो शांतिपूर्ण विरोध उग्र रूप ले सकता है। उन्होंने कहा कि “अभी हम ‘जिंदाबाद’ के नारे लगा रहे हैं, लेकिन जरूरत पड़ी तो ‘मुर्दाबाद’ के नारे भी लगाना जानते हैं।”
📌 कलेक्टर को बाहर आना पड़ा

धरने के दौरान जावरा एवं ग्रामीण एसडीएम ने विधायक को चर्चा के लिए चेंबर में बुलाने की कोशिश की, लेकिन विधायक ने स्पष्ट रूप से मना कर दिया। उनका कहना था कि “जनप्रतिनिधियों और किसानों को कलेक्टर के पास नहीं जाना चाहिए, बल्कि कलेक्टर को जनता के बीच आना चाहिए।”
करीब 15 मिनट तक चले इंतजार और बढ़ते दबाव के बाद कलेक्टर मिशा सिंह को स्वयं अपने चेंबर से बाहर आकर सीढ़ियों पर बैठे किसानों और विधायक से चर्चा करनी पड़ी। इसके बाद प्रतिनिधिमंडल को चेंबर में बुलाकर करीब 10 मिनट तक बातचीत की गई।

कलेक्टर ने आश्वासन दिया कि प्रभावित 8 गांवों का क्लस्टर बनाकर मुआवजे की अधिकतम दर तय करने के लिए अध्ययन कराया जाएगा।
📊 मुआवजे का गणित: ₹2.5 लाख बनाम ₹1 करोड़
धरने के दौरान विधायक और किसान संगठनों ने मुआवजे में भारी अंतर को आंकड़ों के माध्यम से सामने रखा।👇👇
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प्रशासन द्वारा निर्धारित गाइडलाइन के अनुसार मुआवजा: ₹2.20 लाख से ₹2.50 लाख प्रति बीघा
किसानों के अनुसार वास्तविक बाजार मूल्य: ₹80 लाख से ₹1.5 करोड़ प्रति बीघा
किसानों का तर्क है कि प्रस्तावित सड़क परियोजना दिल्ली-मुंबई कॉरिडोर और 8-लेन मार्ग के नजदीक होने के कारण जमीन की कीमत अत्यधिक बढ़ चुकी है, लेकिन मुआवजा पुराने और अव्यवहारिक आंकड़ों पर आधारित है।👎👎
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विधायक मालवीय ने स्पष्ट कहा कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन किसानों के हितों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने कहा, “हम सरकार का विरोध नहीं कर रहे, बल्कि प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं।”
📌 किसानों की प्रमुख मांगें
बाजार मूल्य का आधार: मुआवजा हालिया रजिस्ट्री के आधार पर तय किया जाए
पड़ोसी गांव का मानक: जहां रजिस्ट्री नहीं हुई, वहां पास के अधिकतम मूल्य वाले गांव की दर लागू हो
भविष्य का आंकलन: अगले 10 वर्षों की संभावित कीमत को शामिल किया जाए
समानता का अधिकार: उज्जैन और इंदौर की तरह ही नियम रतलाम में लागू हों
अपडेटेड गाइडलाइन: 11 वर्षों से नहीं बढ़ी गाइडलाइन को आधार न बनाया जाए👎👎
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🟩 महिलाओं की भागीदारी, आंदोलन को मिला व्यापक समर्थन
इस प्रदर्शन में बड़ी संख्या में ग्रामीण महिलाएं भी शामिल हुईं, जिससे आंदोलन को और मजबूती मिली। किसानों ने एकजुट होकर स्पष्ट संकेत दिया कि वे उचित मुआवजे के लिए लंबी लड़ाई लड़ने को तैयार हैं।
🟦 प्रशासन पर बढ़ा दबाव
धरने और चेतावनी के बाद अब प्रशासन पर समाधान निकालने का दबाव बढ़ गया है। कलेक्टर द्वारा क्लस्टर बनाकर अध्ययन कराने का आश्वासन दिया गया है, लेकिन किसानों का कहना है कि जब तक ठोस निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
🔴 निष्कर्ष:
रतलाम में भूमि अधिग्रहण का यह विवाद अब केवल मुआवजे का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह किसानों के अधिकार, प्रशासनिक पारदर्शिता और समानता की मांग का बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में यह मामला और तूल पकड़ सकता है।
Author: Naradh News24
प्रधान संपादक


