जमीन दलाल ने दलाली के अपने सारे हुनर लगा दिए और आखिरकार वर्दी वालों ने मोटी फीस के बदले जमीन दलाल की समस्याएं दूर करने की पूरी व्यवस्था जमा दी।

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वर्दीवालों की कमाई, तथा जमीन दलाल की रिहाई सूबे की बडी अदालत को भी वर्दीवालों ने औकात दिखाई ।

Ratlam,, (रतलाम)पिछले कुछ दिनों से शहर में वर्दी वालों की कमाई और जमीन दलाल को मिली रिहाई की बडी चर्चा है। चर्चा इस बात की भी है कि वर्दीवाले खुद को सूबे की बडी अदालत से भी बडा समझते है। जिस गुनाहगार को बडी अदलिया ने राहत देने से इंकार कर दिया,वर्दी वालों ने उसी गुनाहगार राहत दे दी।

 

मामला वैसे तो काफी पुराना है। इंजीनियरिंग कालेज चलाने वाले जमीन दलाल ने अपनी आदत के मुताबिक दूसरी कालोनी के कई सारे प्लाट दबा लिए थे। जिस कालोनाईजर के प्लाट दबाए गए थे,उसकी शिकायत की जांच हुई और जांच में पता चला कि सनानतियों का नेता बनने वाले इस जमीन दलाल ने ना सिर्फ प्लाट हडपे थे,बल्कि प्लाट हडपने के लिए दस्तावेजों में जालसाजी के कारनामे भी किए थे।

 

जांच के नतीजे में वर्दी वालों ने जमीन दलाल के खिलाफ धोखाधडी और जालसाजी का मुकदमा दर्ज कर डाला। मुकदमा दर्ज होने के बाद अगला कदम गिरफ्तारी का होता है,लेकिन चूंकि मामला बडे जमीन दलाल का था,इसलिए वर्दी वाले फीस लेते रहे और गिरफ्तारी टलती रही। दूसरी तरफ जमीन दलाल ने जमानत हासिल करने के लिए बडी अदालत का दरवाजा भी खटखटा दिया था।

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बडी अदालत के सामने जब मामला आया,तो धोखाधडी और जालसाजी जैसे गंभीर मामलों को देखते हुए बडी अदालत ने जमानत देने से साफ इंकार कर दिया। बडी अदालत ने जब दरख्वास्त को खारिज कर दिया तो अब जमीन दलाल के पास वर्दी वालों को सैट करने के सिवा कोई चारा नहीं बचा था।

 

इसके बाद शुरु हुआ पूरा खेल। जमीन दलाल ने दलाली के अपने सारे हुनर लगा दिए और आखिरकार वर्दी वालों ने मोटी फीस के बदले जमीन दलाल की समस्याएं दूर करने की पूरी व्यवस्था जमा दी। जिस मामले को बडी अदालत ने बेहद गंभीर माना था,उसी मामले को वर्दी वालों ने अपनी चालबाजियों से बेहद हल्का कर दिया।

 

बडीअदालत ने दस्तावेजों की जालसाजी के कारण जमानत नहीं दी थी,वर्दी वालों ने जालसाजी का मामला ही हटा दिया। वर्दी वालों को जैसे ही मोटी फीस मिली उन्होने मामले में फिर से जांच की और जालसाजी के आरोप हटा दिए।

जालसाजी की धाराएं हटी तो जमीन दलाल ने फौरन थाने पर हाजरी लगा दी और थाने वालों ने भी फौरन जमीन दलाल को नोटिस देकर रवाना कर दिया। अब ये पूरी कहानी फिजाओं में गूंज रही है। वर्दी वालों ने इस काम की कितनी फीस ली,किस किस ने ली और कितनी कितनी ली? ये सारे सवाल पूछे जा रहे हैैं।

हर कोई जानता है कि किसी दारोगा की इतनी हिम्मत नहीं हो सकती कि वह खुद इतना बडी कदम उठा सके।

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ऐसे मामले फूल वाले अफसरों के बस के नहीं होते। ऐसे मामले जिन के कन्धे पर भारत के तीन शेर वाले निशान लगे होते है उन्ही के बस के होते है। जमीन दलाल को रिहाई किसके कहने पर मिली? खोजने वाले अब इसी की तलाश में जुटे है।

अवैध स्कूल और शहर सरकार के नोटिस की कहानी

बीते हफ्ते में दूसरी बडी कहानी भी एक जमीन के दलाल से ही जुडी हुई है। करीब तीस साल पहले जमीन के इस दलाल ने शहर सरकार के नेताओं से जोड जुगाड करके स्कूल के लिए रिजर्व एक जमीन को कौडियों के दाम पर अपने कब्जे में ले लिया था। खुद को राजाओं का इन्द्र बताने वाला ये जमीन दलाल भी जालसाजी और फर्जीवाडे का मास्टर है। जमीन के इस दलाल ने जमाने भर की जालसाजी करके स्कूल के नाम पर जमीन हडप ली और फिर एक अवैध स्कूल भी चला लिया।

जानकार लोगों ने जब इस मामले की शिकायत की तो जांच में जमीन दलाल की सारी जालसाजी सामने आ गई। नतीजे में जमीन दलाल और उससे सांठ गांठ करने वाले नेता अफसरों पर मुकदमा भी दर्ज कर दिया गया।

 

मुकदमा उन पर दर्ज हुआ था,जिन्होने बरसों पहले यह घोटाला किया था,लेकिन अभी वाले अफसर नेता भी जमीन दलाल के एहसानों तले दबे हुए है। अगर ऐसा ना होता तो जमीन दलाल पर मुकदमा दर्ज होते ही अवैध स्कूल की जमीन शहर सरकार ने वापस ले ली होती। लेकिन शहर सरकार के अफसरों ने ऐसी कोई कोशिश तक नहीं की।

 

शहर सरकार के हाल के सम्मेलन में पंजा पार्टी के नेता जब ये सवाल उठाया,तो शहर सरकार के बडे साहब ने बडी मासूमियत से जवाब दिया कि इस मामले में नोटिस देने की तैयारी की जा रही है। बडे साहब की मासूमियत पर लोग कुर्बान हो गए। पूछा जा रहा है कि महज नोटिस जारी करने के लिए कितने वक्त तक तैयारी करना पडती है? मुकदमा दर्ज हुए भी कई बरस बीत चुके है और अब तो मामला अदालत में भी पंहुच गया है। लेकिन इसके बावजूद शहर सरकार के अफसर अभी नोटिस ही देने की तैयारी कर रहे है।

साफ जाहिर है कि तमाम अफसर जमीन दलाल के एहसानों तले जमकर दबे हुए है। यही वजह है कि करोडों रुपए वाले अवैध स्कूल को कब्जे में नहीं लिया जा रहा है।

Naradh News24
Author: Naradh News24

प्रधान संपादक

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